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Thursday, November 19, 2015

टीपू सुल्तान विवाद: सच क्या है? (सौरभ शाह)

मुंबई समाचार में गुजराती स्तंभ लेखक सौरभ शाह की टीपू सुल्तान लेख श्रेणी के तहत 16 नवम्बर 2015 को प्रकाशित पहले लेख का हिन्दी अनुवाद:

इतिहास के साथ समस्या यह है कि एक साधारण व्यक्ति के तौर पर आप उसे चुनौती नहीं दे सकते, क्योंकि आपके पास इतिहास का वही विवरण होगा जो आपको स्कूल में पढ़ाया गया होगा या आपने किसी से सुना होगा। इतिहास के मूल दस्तावेजों तक आप पहुँच नहीं पाएँगे।  

जो लोग इतिहास के क्षेत्र में अनुसंधान करते हैं या अभ्यास करते हैं उन्हें भी यही समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर वे प्रचलित ऐतिहासिक 'तथ्यों' को चुनौती देते हैं तो कुछ इतिहासकार बेनक़ाब हो जाने के डर से उन्हें सहयोग नहीं देंगे, उनके अनुसंधान में बाधाएँ डालने की कोशिश करेंगे और उन्हें अपने समूह से अलग कर देंगे। उनको मिल रहे अनुदान और सुविधाओं पर रोक लगवा देंगे। यदि सभी बाधाओं को पार करके कोई नए तथ्य भी ढूंढ निकालता है तो उसे दक्षिणपंथी विचारधारा का पिछलग्गू या हिन्दू फन्डमेन्टलिस्ट क़रार दे दिया जाएगा।

टीपू सुल्तान के मामले में भी अब तक यही होता रहा है और कर्नाटक में यही हो रहा है। टीपू सुल्तान के मसले को लेकर हुए दंगो में विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यकर्ता की सरेआम हत्या कर दी गई। कलबुर्गी की हत्या पर बवाल मचाने वाले, मीडिया में तार स्वर पर चीख़ने चिल्लाने वाले और पुरस्कार लौटाने वाले बौद्धिक इस हत्या पर मौन धारण किए हुए है। मशहूर फ़िल्मी संवाद 'तुम्हारा ख़ून ख़ून और हमारा ख़ून पानी' जैसा सूरत-ए-हाल कर्नाटक में बना हुआ है। 

यह लेख श्रेणी लिखते वक्त जिन संदर्भों का आधार लिया गया है वे इस प्रकार हैं:
  1. 'हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान', मोहिबुल हसन, संशोधित संस्करण
  2. 'ग्लिम्प्सिस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' और 'मारुं हिन्दनुं दर्शन' (अनुवाद: मणिभाई देसाई) लेखक: पंडित जवाहरलाल नेहरु
  3. 'द हिस्ट्री ऐन्ड कल्चर ऑफ द इन्डियन पीपल' के 11 खंडों में से सातवें ('द मुग़ल एम्पाइअर'), आठवें ('द मराठा सुप्रीमसी') तथा नौवें ('ब्रिटिश पैरामाउन्सी ऐन्ड इन्डियन रेनेसां') खंडों में टीपू सुल्तान के बारे में जितने संदर्भ दिए गए हैं वे सब अंकित किए है।
  4. 'द टाइरन्ट ऑफ मैसूर', संदीप बालकृष्ण
  5. अमर चित्रकथा श्रेणी अंतर्गत टीपू सुल्तान पर प्रकाशित किताब
टीपू सुल्तान का समर्थन करके गिरीश कर्नाड और अन्य बौद्धिकों ने जो विवाद खड़ा किया उसका इतिहास पुराना है। इससे पहले अभिनेता-दिग्दर्शक संजय ख़ान ने भगवान गिडवानी के उपन्यास 'द स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान' पर आधारित धारावाहिक बनाया था, तब इस प्रकार का विवाद हुआ था। टीपू सुल्तान को लार्जर दैन लाइफ हीरो के रूप में पेश करने वाला यह धारावाहिक 1990 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ तब उसके प्रसारण पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कॉर्ट तक के दरवाजें खटखटाए गए थे। टीपू सुल्तान के जीवन से जुड़ी हक़ीक़तो के साथ छेड़-छाड़ हुई है और उनके कुकर्मों को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्हें महानायक के रूप में चित्रित किया गया है ऐसा तर्क सबूत के साथ रखा गया जिसका सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि इस धारावाहिक के हर एपिसोड के आरंभ में यह तरदीद दिखाई जाए कि इस धारावाहिक की कथा काल्पनिक है और टीपू सुल्तान के ऐतिहासिक पात्र से इसका कोई संबंध नहीं है। 

यह फ़ैसला हास्यास्पद इसलिए था क्योंकि अगर यह धारावाहिक ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं था तो उसके निर्माण और प्रसारण पर ही प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए था। अगर कल कोई ऐरा-ग़ैरा नत्थू-ख़ैरा ऐसा उपन्यास लिखे जिस में महात्मा गांधी का चरित्रहनन हुआ हो और उसके आधार पर कोई धारावाहिक बने जिस में ऐसी तरदीद दिखाई जाए कि इस धारावाहिक की कथा काल्पनिक है और गांधीजी के ऐतिहासिक पात्र से इसका कोई संबंध नहीं है, तो क्या उच्चतम न्यायालय ऐसे बेतुके धारावाहिक या फ़िल्म के निर्माण एवं प्रसारण की अनुमति दे देगा?

ख़ैर, टीपू सुल्तान धारावाहिक का शूटिंग जारी रहा। 1989 के फ़रवरी महिने में बतौर निर्माता संजय ख़ान की लापरवाही के कारण सैट पर शॉर्ट सर्किट की घटना के चलते 62 लोग आग में जल कर राख हो गए। आग में बुरी तरह झुलस जाने के कारण ख़ुद संजय ख़ान को 13 महिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा जहाँ उन पर 72 बार छोटी-बड़ी सर्जरी की गई। मृतकों और ज़ख़्मी लोगों के 17 परिजनों को 85,000 रुपए और अन्य को 5,000 रुपए की अनुग्रह राशि का भुगतान किया गया। कुछ महिनों बाद शूटिंग फिर से शुरु हुआ।

अब इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि एक ओर जहाँ पाकिस्तान ने अपनी लम्बी दूरी तक मार करने वाली एक मिसाइल को टीपू नाम दिया था, वहीं दूसरी ओर 2012 में युपीए सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री रहमान ख़ान ने अपने मंत्रालय के तहत कार्यरत मौलाना आज़ाद एजुकेशन फ़ाउन्डेशन द्वारा देश में शुरु किए जाने वाले पाँच विश्व विद्यालयों में से श्रीरंगपट्टनम में बनने वाले विश्वविद्यालय का नाम टीपू सुल्तान युनिवर्सिटी होगा ऐसा एलान किया था। ऐसा भारत में ही हो सकता है।

टीपू सुलतान से संबंधित विवाद में गिरीश कर्नाड का नाम सामने आया हो ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले 2005-06 में भी टीपू सुल्तान जयंती को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। ये बौद्धिक लोग इस तरह के विवाद खड़े करने में माहिर होते हैं। टीपू सुल्तान ने कई पुल या रास्तें बँधवाए थे ऐसी हक़ीक़तों को तथ्य मानकर चलते हैं और टीपू के व्यक्तित्व के दूसरे पहलुओं पर चर्चा होती है तो उसे 'विवादास्पद' ठहरा देते हैं। (मतलब ये होता है कि दूसरे पहलुओं की सत्यार्थता से वे वाकिफ होते हैं लेकिन सत्य स्वीकार करने से कतराते हैं इसलिए हक़ीकतों को इस हद तक तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं कि सामान्य व्यक्ति को भनक तक लगती नहीं कि ये इतिहासकार उसके मन में इतिहास के नाम पर मनघडंत कहानियाँ ठूँस रहे हैं।)

दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदल कर अब्दुल कलाम रोड किया गया तब औरंगजेब के सेक्युलर प्रशंसक बौखला गए थे। लाख कोशिशों के बावजूद जब सेक्युलर इतिहासकार औरंगजेब के कुकर्मों को छुपा नहीं पाते तब वे इतिहास को विकृत नज़रिये से पेश करते हैं। औरंगजेब ने बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करवाया था। इस हक़ीक़त को छुपाने में सभी इतिहासकार विफल रहे तो उन्होंने औरंगजेब की इस घिनौनी करतूत को वाजिब ठहराने के लिए मनघडंत बात कह दी कि काशी के महाराजा ने औरंगजेब की एक बेगम को छेड़ा था जिसके प्रतिशोध स्वरूप औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर नष्ट करवा दिया!

ऐसा कुछ पहले भी सुना हुआ लगता है न?

27 फ़रवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 59 हिन्दूओं को ज़िन्दा जला देने की दुर्घटना हुई तब राजदीप सरदेसाई ने एनडीटीवी पर एक घंटे की डाक्युमेन्टरी दिखला कर कौन सी थीअरी पेश की थी? यही कि रामसेवकों ने गोधरा स्टेशन पर किसी मुस्लिम लड़की को प्लैट्फॉर्म से उठाया और डिब्बे में उसके साथ दुष्कर्म किया जिससे क्रोधित हुए मुसलमानों ने 59 हिन्दूओं को जला दिया!

(Link to the original Gujarati article: 

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ अब्तर के कुछ उदाहरण-5

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ अब्तर के कुछ उदाहरण. 2122 1122 1122 22.

(41)
وہ تو خوش بو ہے ہواؤں میں بکھر جائے گا
مسئلہ پھول کا ہے پھول کدھر جائے گا

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
                                                                                                   - परवीन शाक़िर

(42)
عاشقی صبر طلب اور تمنا بیتاب
دل کا کیا رنگ کروں خون جگر ہوتے تک

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक
                                                      - ग़ालिब

बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम के कुछ उदाहरण-3

बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम के कुछ उदाहरण-3. बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम के कुछ उदाहरण-2. 1222 1222 1222 1222,લગાગાગા લગાગાગા લગાગાગા લગાગાગા

(21)
अमल से ज़िन्दगी बनती है जन्नत भी जहन्नुम भी 
ये ख़ाकी अपने फ़ितरत में न नूरी है, न नारी है
                                                                          ~ इक़बाल
(22)
કરાવી દે ઓ સૂરજ! એમના અસ્તિત્વ નું દર્શન,
ઘણા ખાબોચિયાં ખુદને સમંદર સમજી બેઠા છે.
                                                   (અજ્ઞાત)

Tuesday, November 10, 2015

सज धज करके सामने जब तू रहता है (के.पी. अनमोल)

सज धज करके सामने जब तू रहता है
क्या बतलाऊँ कैसे क़ाबू रहता है

जो भी तुझको देखे, तेरा हो जाये
तुझमें शायद काला जादू रहता है

रूह मेरी हर वक़्त महकती है जैसे
कोई मुझमें बनके खुशबू रहता है

है नहीं दुष्यंत की या मीर की (के.पी. अनमोल)

है नहीं दुष्यंत की या मीर की
ये ग़ज़ल तो है सदा बस पीर की

जलजले, सैलाब, तूफां, आँधियाँ
ये ही तो बुनियाद हैं तामीर की

जब क़लम लिखने लगे इंसाफ़ तो
फिर भला औक़ात क्या शमशीर की

ઝુલ્ફમાં ભૂલી પડેલી આંગળી, તેં સાંભળ્યું? (વિનોદ જોશી)

"ઝુલ્ફમાં ભૂલી પડેલી આંગળી, તેં સાંભળ્યું ?
રાતભરનો થાક લઈ પાછી વળી, મેં સાંભળ્યું.

આંગળી ખંડેરનો હિસ્સો નથી, તેં સાંભળ્યું ?
છે હવે ગુલમહોરની કળી, મેં સાંભળ્યું.

ટેરવે ઘેઘુર સન્નાટો હતો, તેં સાંભળ્યું ?
દરબદર વાગે હવે ત્યાં વાંસળી, મેં સાંભળ્યું.

છે ઉઝરડા મખમલી આકાશમાં, તેં સાંભળ્યું ?
આ નખોનું નામ હિંસક વીજળી, મેં સાંભળ્યું.

ફૂલને ભમરો નથી સ્પર્શ્યો જરી (મગન મંગલપંથી)

ફૂલને ભમરો નથી સ્પર્શ્યો જરી,
વાયરાએ વાત ત્યાં વહેતી કરી !

પુષ્પ ડાળીએ મજાનું એકલું ,
ઝૂલતું'તું શ્વાસમાં ખુશબો ભરી.

પાંખડીઓ કેમ કરમાઈ હશે ?
લાગ જોઈ લાગે છે, 'છેડી ખરી !'

15 ગુરુની બહરના ઉદાહરણો

15 ગુરુની બહરના ઉદાહરણો

(1)
यूँ ही बस वो मुझको छोड़ के सबसे मिलता रहता है
बच्चा भी तो ग़लत किताबें रख लेता है बस्ते में । 
                                                                  - शहनाज़ परवीन सहर

इतनी शर्तों पर कोई कैसे संभाले ज़िन्दगी (साजिद सफ़दर)

इतनी शर्तों पर कोई कैसे संभाले ज़िन्दगी
सोचता हूँ कर ही दूँ उसके हवाले ज़िन्दगी
اتنی شرتوں پر کوئی کیسے سنبھالے زندگی 
سوچتا ہوں کر ہی دوں اس کے حوالے زندگی

वक़्त ए आखिर तुझको मोहलत ही कहाँ मिल पायेगी 
वक़्त रहते नेकियां भी कुछ कमा ले ज़िन्दगी 
وقت آخر تجھکو موہلت ہی کہاں مل پایگی 
وقت رہتے نیکیاں بھی کچھ کما لے زندگی 

इम्तेहाँ कोई भी हो निकलेंगे हम साबित क़दम 
जैसे चाहे हमको वैसे आज़मा ले ज़िन्दगी 
امتحاں کوئی بھی ہو نکلیںگے ہم صابط قدم 
جیسے چاہے ہمکو ویسے آزمالے زندگی 

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ अब्तर के कुछ उदाहरण-4

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ अब्तर के कुछ उदाहरण. 2122 1122 1122 22

(31)
मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी
अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

مل کے ہوتی تھی کبھی عید بھی دیوالی بھی
اب یہ حالت ہے کہ ڈر ڈر کے گلے ملتے ہیں
                                                                                             (शायर नामालूम)

(32)
ठीक है जाओ तअल्लुक़ न रखेंगे हम भी 
तुम भी वादा करो अब याद नहीं आओगे !
                                                      अलीना इतरत

ٹھیک ہے جاؤ تعلک نہ رکھینگے ہم بھی
تم بھی وعدہ کرو اب یاد نہیں آؤگے

(33)
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़्ता है
                                             राहत इन्दोरी

اس کی یاد آئی ہے سانسو ذرا آہستہ چلو
دھڑکنوں سے بھی عبادت میں خلل پڑتا ہے

(34)
जब भी फुर्सत मिली हंगामा ए दुनिया से मुझे,
मेरी तन्हाई को बस तेरा पता याद आया
                                           - अलीना इतरत

جب بھی فرصت ملی ھنگامہ دنیا سے مجھے
مری تنہائی کو بس تیرا پتہ یاد آیا

(35)

اب کسی راہ پہ جلتے نہیں چاہت کے چراغ
تو مری آخری منزل ہے مرا ساتھ نہ چھوڑ

अब किसी राह पे जलते नहीं चाहत के चराग़
तू मेरी आख़िरी मंज़िल है, मेरा साथ न छोड़
                                                 - मज़हर इमाम

Tuesday, November 3, 2015

मैं नहीं वो जो सब की हाँ में हाँ मिलाऊँगा (ज़ुबैर अली ताबिश)

मैं नहीं वो जो सब की हाँ में हाँ मिलाऊँगा
जिस तरफ़ से रोकोगे उस तरफ़ से जाऊँगा

उसके चाँद तारों का बोझ क्यूं उठाऊँगा
मैं मेरी ज़मीन पर ही आसमां उगाऊँगा

तुम मेरी तबाही से बेसबब परेशां हो
जाओ मैं किसी से भी कुछ नहीं बताऊँगा

जो चमन में रहता है वो ख़िज़ा का दुख झेले
मैं बहार के नक़्शे रेत पर बनाऊँगा

Monday, November 2, 2015

In search of an invite to buy a OnePlus 2 smartphone

A couple of months back, Vidhi, my wife, felt the need to have a new smartphone as her old Samsung Galaxy S3 smartphone stopped functioning efficiently thanks to the repeated slamming of the phone on a floor of the house by Falak, our two year old boisterous son! Having used an Android OS for quite a long time, one of the relatives suggested her to switch to a Microsoft device and gave a positive review of it. With the options like Gionee, Xiaomi, HTC, Microsoft etc. suggested by a nearby smartphone vendor, she finally zeroed in on Microsoft Lumia 640 XL. While the phone works fine without glitches, she is finding it difficult to operate it with same ease as she operated an Android device earlier. She has not been able to accustom to the change of an OS even after two months. Plethora of apps available on Android platform makes her miss the most popular mobile phone OS so much so that she is thinking of dumping the Microsoft device and replacing it with a new Android alternative!




Sunday, November 1, 2015

પછી શબ્દનાં સૌ રહસ્યો ખૂલે છે (જિગર જોષી 'પ્રેમ')

તમે પ્હેલાં પાણીથી તમને દઝાડો - પછી શબ્દનાં સૌ રહસ્યો ખૂલે છે,
તિરાડો બની જાય જે ક્ષણ પહાડો! - પછી શબ્દનાં સૌ રહસ્યો ખૂલે છે.

તમે એવું ધારીને જોયા કરો તો એ સંભવ છે બારી જ આકાશ થઈ જાય,
પરંતુ પ્રથમ એવું ધારી બતાડો - પછી શબ્દનાં સૌ રહસ્યો ખૂલે છે.

આ નક્ષત્રો નભગંગા ખાબોચિયું છે ને એમાં કોઇ પગ પખાળી ગયું છે,
જ્યેં ધરતી લાગે બસ એક નાનો ખાડો - પછી શબ્દનાં સૌ રહસ્યો ખૂલે છે.

જળ કર્યાં જુદાં બધાએ ને અલગ કાંઠા કર્યા (રાજેશ વ્યાસ 'મિસ્કીન')

જળ કર્યાં જુદાં બધાએ ને અલગ કાંઠા કર્યા
ધોધથી છુટ્ટા પડી ખાબોચિયાં નાનાં કર્યાં.

રાજમાર્ગે ચાલનારા છે તરત ભૂલી ગયા,
ને અહમને કારણે ફંટાઈ જઈ ફાંટા કર્યા.

એ જ સુખ ને એ જ દુ:ખ ને એ જ તડકો-છાંયડો,
આંસુઓએ આમ બાવળના સદા આંબા કર્યા.

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ (राजेश रेड्डी)

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ
उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ

हिंदू को हिंदू मुसलमान को लिक्खूँ मुस्लिम
कभी इन दोनों को इक साथ न लिखने पाऊँ

बस क़लमबंद किए जाऊँ मैं उनकी हर बात
दिल से जो उठती है वो बात न लिखने पाऊँ

सोच तो लेता हूँ क्या लिखना है, पर लिखते समय
काँपते क्यों है मेरे हाथ, न लिखने पाऊँ

जीत पर उनकी लगा दूँ मैं क़सीदों की झडी
मात को उनकी मगर मात न लिखने पाऊँ

                                                      - राजेश रेड्डी